इश्क के दरवाजे पर ताला
(अप्रकाशित उपन्यास ‘राजा, जंगल और काला चाँद’ का एक अंश)
(1)
राजा की सता को खत्म कर दिया गया था। अब उसकी जरुरत न थी। प्रजातंत्र आ चुका था।
पर जंगल.....?
जंगल मानता था, कि राजा का खत्म होना याने अकाल, प्रलय, विनाश......। जंगल जानता था कि राजा याने देवता। राजा याने सबसे बडा पुरोहित। राजा जिसकी इच्छा से चलती है पूरी कायनात। जंगल के लिए राजा याने सब कुछ।
राजा मारा जा चुका था ।
जंगल जानता था कि राजा कभी मरता नहींं । वह अजेय है। अमर है।
जंगल का राजा कभी खत्म नहीं हो सकता था।
मरकर भी वह था। हमेशा था । उसे आगे भी रहना था।
बस्तर के बडे शहर याने जगदलपुर में जहाँ ओल्ड नरेन्द्र टाकीज थी, वहाँ से पास ही एक सुनार रहता था। उसकी एक छोटी सी दुकान थी। दुकान में काँच के दो छोटे बॉक्सों में गिलट के आभूषण लटके होते थे। सिक्कों वाला हार, फुल्ली, कर्णफूल, कंगन, पैरों और बाहों में पहनने के कडे, बिछिये.......... और भी जाने क्या क्या तो उन बाक्सों में काँच की दीवरों के बीच लटकता रहता। वह बस्तर की औरतों को यह सब बेचना चाहता था। बस्तर से बाहर वह यह धंधा कर चुका था। उसे इसका खासा अनुभव था ।
पर जंगल में आभूषण बेचना बेहद कठिन था। जंगल उस औरत का जंगल था, जिसने ब्लाउज की सत्ता को ठुकरा दिया था। जिसे कपडे पहरने में शर्म आती थी। ऐसी औरत को आभूषण बेचना कठिन था, बहुत कठिन। सुनार यह जानता था।
जंगल की औरतें जब बडे शहर आतीं, उसकी दुकान के सामने से गुजरतीं। वह दुकान ऐसी जगह थी जिसके सामने से लोगों को गुजरना पडता था। सुनार उन्हें उनकी भाषा में आभूषणो के बारे में बताता। वह उन औरतों से उनकी भाषा में बातें करता। उसने बडी मशक्कत से बस्तर की भाषा सीखी थी। वह मारिया और हल्बी दोनों में बात कर सकता था। जंगल की औरतें ठिठक कर उससे बोलतीं, बतियातीं। वह उन्हें आभूषणों के बारे में बताता। उसके ऐसा बताने पर वे हँसतीं, शर्मातीं या कभी-कभी भोकवे की तरह उसे देखतीं। वे उसकी दुकान पर नजर डालतीं। टकटकाती सी उसकी दुकान को घूरतीं। फिर उसकी बात को सुनतीं। फिर एक दूसरे को ताकतीं। आभूषण की बात पर किस तरह बात की जाये, यह उन्हें नहीं आता था। वे औरतें आभूषणों पर खुश होना नहीं जानती थीं। उन्हें नहीं पता था कि आभूषणों पर कैसे बात की जाती है। वे मुस्कुराते हुए चहककर बात करना चाहती थीं। पर क्या ऐसा करना ठीक होगा ? उन्हें नहीं पता था। बस्तर में गिलेट के आभूषण इतने कमतर थे कि वे कौतुहल थे। उन पर बात करने का शऊर अब तक नहीं बना था।
कभी यूँ भी होता कि सुनार उनमें से किसी औरत को अपनी दुकान में ले आता । फिर आहिस्ते से सिक्कों वाला हार उसके गले में डाल देता। फिर उससे खुद को दर्पण में देखने को कहता। आभूषण के नाम पर जो सबसे ज्यादा प्रचलित था वह यही था, सिक्कों वाला हार। औरत खुद को दर्पण में देखती। होता यूँ कि औरत दर्पण के सामने डरती सी खडी हो जाती। थोडा ठिठकती, थोडा इधर उधर ताकती, थोडा लजाती, थोडा गर्दन झुकाती, कभी थोडा मुस्कुराती....धीरे से सरकती दर्पण के सामने खडी होती। उसे ठीक-ठीक पता नहीं था कि दर्पण के सामने किस तरह खडा हुआ जाता है ? जब गले में एक नया हार पडा हो तब दर्पण के सामने क्यों खडा हुआ जाता है ? जब दर्पण के सामने खडे हो तब मन में क्या बात आनी चाहिए ? क्या दर्पण के समाने डरते हुए खडा होना ठीक है ? वे यह सब न जानती थीं। पर सुनार यह सब जानता था। वह पक्का व्यापारी था। वह दर्पण के सामने जंगल की औरत के खडे होने के तरीके से ही उसके बारे में सब जान जाता था।
औरत के सकुचाने, हाथों से मुँह दबाने, सिर झुकाकर मुस्कुराने, सपाट चेहरे के साथ दर्पण को घूरने, दर्पण के सामने निरुद्देश्य आँखें गोल-गोल घुमाने....सुनार को हर बात का मतलब पता था। व्यापार के मामले में बस्तर की औरत की हर अदा के मायने वह जानता था। कभी यह भी होता कि औरत दर्पण के सामने इस तरह खडी होती कि दर्पण में सिर्फ उसका चेहरा दीख रहा होता। सिर्फ चेहरा। और गले में पडा हार दर्पण में नहीं दीख रहा होता। दर्पण में हार नहीं दिख रहा होता। सिर्फ चेहरा दिख रहा होता। उसे पता न होता कि हार पहरकर जब दर्पण देखते हैं, तब दर्पण को इस तरह से देखना होता है कि, हार और चेहरा दोनों दिखाई दे। तब सुनार दर्पण को इस तरह झुकाता ताकि औरत का चेहरा और हार दोनों साथ-साथ दर्पण में देखे। ऐसा करते हुए सुनार मुस्कुराता। औरत भी कभी-कभार लजाती सी मुस्कुरा देती।
अक्सर कुछ ऐसी औरतें सुनार के आग्रह पर उसकी दुकान के भीतर चली आती थीं, जिन्हें यह ठीक ठीक नहीं पता था कि दर्पण क्या है, कि उसका क्या प्रयेग है ? कुछ ऐसी भी थीं जिन्होंने दर्पण तो देखा था पर दर्पण और औरत के संबंध से वे बाबस्ता न थीं। उन्हें नहीं पता था कि औरत के लिये दर्पण का क्या महत्व होता है ? कुछ ऐसी भी थीं जिन्होनें कभी इतना बडा दर्पण नहीं देखा था, जितना कि उस दुकान में था। कुछ ऐसी थीं, जो कौतुहल से दर्पण देखती थीं और चाहती थीं कि सुनार उन्हें देर तक दर्पण देखने दे। उन्होंने जीवन में बहुत कम बार इतना साफ और बडा दर्पण देखा था। कुछ ने तो कभी भी नहीं देखा था। कुछ ने छोटा दर्पण देखा था, पर इतना बडा नहीं। कुछ खुद को इतने बडे दर्पण में देखकर खिलखिलाकर हँस पडतीं। जैसे एकदम से कोई तारा टूटता है, समुद्र की कोई लहर अकस्मात किसी विशाल चट्टान से टकरा कर बिखर जाती है, कुछ-कुछ वैसा ही। सुनार की दुकान में हँसी का ठ्ठठा गूँजता। काँच के दो छोटे बक्सों का काँच पल भर को कँपकँपाता। कभी हँसती औरत अपनी हँसी से लजा जाती और अपनी सहेली के कंधे में अपना सिर छिपा लेती। कभी राह चलता कोई हँसी सुनकर सुनार की दुकान की तरफ पल भर को देखता। कभी ठहाके की गूँज से मुंडेर पर बैठा कबूतर फडफडाता उड जाता। कभी हँसी के कंप से काँच के बीच लटकती पायल एक पल को काँपती....। यह सब सुनार के व्यापार का हिस्सा था। यद्यपी अभी भी उसे बहुत कुछ सीखना था।
सुनार की दुकान में एक छोटी भट्टी लगी थी। उस भट्टी में हवा देने का हाथ से घूमने वाला पंखा लगा था। एक आदिवासी लडका जिसका नाम कोदरा था उस भट्टी के अंगार में हवा झोंकता रहता था। सुनार उस भट्टी में धातु गलाता। चिमटे से उसे तोडता-मरोडता। धातु के तार को भट्टी में नरम करता। गलकर टपकने को तैय्यार लटकती धुँधाती लाल धातु की बूँद को मुख्य टुकडे पर टिकाकर उस पर दबाकर टाँका लगाता। कभी लाल-लाल धातु को धीरे-धीरे हथौडी से पीटता। कभी फिर से धातु को भट्टी में मुलायम लाल होने तक गर्म करता। फिर चिमटी से उसे उलट-पलटकर देखता। हथौडी से आहिस्ता-आहिस्ता उसे पीटता। घुमा-घुमाकर उसका मुआयना करता। कभी अचानक लाल-लाल धातु पर ढेर सारा पानी उँडेल देता और सबकुछ छोडकर दुकान के दरवाजे पर खडा हो बाहर रोड को ताकता।
कोदरा जवान था। बलिष्ट। खूबसूरत। वह जंगल की औरतों से उनकी भाषा में बात करता। हँसी ठिठोली करता। बताता कि कौन सी औरत किस गहने में खूबसूरत लग रही है। कुछ औरतों को उसका ऐसा करना अच्छा लगता । सुनार ने उसे औरतों से बातें कर गहने के लिए पटाने के काम में लगाया था। इसके लिए वह उसे अलग से मेहनताना देता था। वह खुशबू वाला तेल और नये-नये साफ सुथरे कपडे पहरकर दुकान में बैठता था। वह औरतों से बडी मोहब्बत से बात करता। उसका अंदाज ठेठ जंगल का अंदाज था, जो उन औरतों को सुहाता था। उन्हें आभूषण पहराते, दर्पण दिखाते वह जंगल का कोई गीत गुनगुनाता। ठिठोली करता। रेला नृत्य की किसी धुन पर सीटी बजाता। उन औरतों की तारीफ करता। कभी आभूषण पहराते हुए वह उन्हें धीरे से छूता। उनकी गर्दन पर उसकी उंगली का स्पर्श एक जगह से दूसरी जगह तक रेंगता। कभी उनकी बाहों में उसकी तर्जनी और अंगूठा धंस जाते। कभी वह जानबूझकर गर्दन की मोटी नस पर अपनी उंगली रखता। नस के भीतर का कंप और प्रवाह का कोमल अहसास उंगली के पोरवे पर टिक जाता। कंगन पहराते वक्त वह धीरे से उनकी उंगलियाँ अपने हाथों में ले लेता। जब कंगन आसानी से हाथ में न जाता तो वह उनकी उंगलियाँ अपने हाथों में भींच लेता। देर तक हथेली में उनकी उंगलियों को भींचे रखता। उनकी उंगलियाँ उसकी हथेली के पसीने में नहा जातीं। औरत उसे घूर रही होती और वह अपने काम में मगन होता। वह बडे धैर्य के साथ किसी औरत के कानों में फुल्ली का कांटा घुसाता। कान के पीछे उसकी घुण्डी को घुमेडते हुए उसे लगता जैसे वह कान के ठीक पीछे अपने होंठ लगा सकता है। अपनी जीभ के पोर से उसे छू सकता है। कान की जडों पर ऊपर से नीचे तक जीभ के पोर को फेर सकता है।
जंगल में बंदिशें नहीं थीं। सुनार जानता था। इसीलिए वह कोदरा को ऐसा करने को कहता था। कोदरा जानता था कि कब और किसके साथ ऐसा किया जा सकता है। फिर जो आभूषण जिस औरत पर अच्छा लगता वह उसे ही अच्छा कहता। सुनार उसे टोकता। कहता इसे नहीं उस आभूषण को अच्छा कहो। कोदरा ने कोशिश भी की। वह सुनार के कहे अनुरुप ही आभूषण को अच्छा या खराब कहने की कोशिश करता। पर उसे लगता मानो ऐसा करके वह कोई पाप कर रहा हो। किसी खूबसूरत औरत को देखकर वह चूक जाता। फिर वह उसी आभूषण को अच्छा कहता जो उस औरत पर अच्छा लगता। बहुत कोशिश के बाद भी वह अंततः चूक ही जाता। पर सुनार ? सुनार कहता कि फलाँ गहना बिकने पर ज्यादा पैसा मिलेगा। लेकिन कोदरा किसी और गहने को ज्यादा अच्छा बोल ही देता। कोदरा यह गलती बार बार कर जाता। जब वह औरत की देह को गौर से देखता तब वह झूठ नहीं बोल पाता।
जब वह किसी औरत को दर्पण देखने में मदद करता। उसके गले में हार डालता। उसकी बाजू में बाजूबंद फँसाता। वह मुस्कुराता। औरत को घूरता, उसकी आँख में आँख डाल वह कह ही देता, जो कहने का उसका मन होता। जंगल की भाषा में सच्ची-सच्ची। सुनार जानता था कि लडका बिजनेस के माफिक नहीं है। पर उसकी बात में कुछ था कि औरतें उसकी बात मान जाती थीं। वह उनके सामने उनको घूरता हुआ बताता कि वह कितनी तो सुन्दर लग रही है । औरतें कोदरा को देखतीं। उसकी आँखों के पार देखतीं। उसकी मुस्कान को छू कर देखतीं । जंगल के शब्दो में कही कोदरा की बात बार-बार सुनतीं। दर्पण छोड कोदरा को टकटकातीं। मानो वह कोदरा न हो दर्पण हो, जो बिल्कुल सच कह रहा हो। अक्सर औरत को कोदरा की बता पर यकीन हो जाता और वह, वह आभूषण ले जाती।
सुनार ने इसी वजह से कोदरा को टिका रखा था। ठीक है कि वह बिजनेस के मुताबिक नहीं है, पर फिर भी जंगल की औरतों को उसकी बात सबसे सही लगती । जंगल की औरतों को कोदरा की बात दर्पण से भी ज्यादा सही लगती थी। बस्तर के जंगलों के व्यवहार में बिजनेस नहीं था। वह आभूषण खरीदना और बेचना नहीं जानता था। वह प्रेम पर ज्यादा विश्वास करता था। वह दर्पण पर विश्वास नहीं कर पाता था। वह आँखों पर दीखने से ज्यादा आसक्त था।
एक दिन एक लडकी दुकान आई। बाहर बारिश हो रही थी। लडकी सिर पर पŸां वाली छतरी ओढकर आई थी। बहुत से पŸां को गूंथकर बनाई विशाल गोलाकार छतरी उसके सिर पर टिकी थी। गोलाकार छतरी में बान की रस्सी लगी थी जो छतरी से उसके एक कान के पीछे से, ठोडी के नीचे से होकर दूसरे कान के पीछे से छतरी तक मजबूती से बंधी थी ताकि छतरी उसके सिर पर टिकी रहे। छतरी के कारण उसका चेहरा न दीखता था। वह थोडी देर तक दुकान के बाहर खडी रही थी। फिर उसने वह छतरी सिर से उतारकर एक तरफ रख दी। उसने कुंजार बिल्ला (एक लकडी का पट्टा जिस पर बस्तर की औरतें बालों को गूँथकर जूडा बनाती हैं) पर करीने से अपने बालों को गूँथते हुए जूडा बनाया था। फिर उसे टिकाये रखने के लिए उसमें कुँजार-कोटो (लकडी के पिन) लगाये थे। उसने करीने से अपनी जुलपिन (माँग के दोनों तरफ के बाल) संवारे थे। वे सपाट और चिकने थे। जुलपिन में लकडी के चार कंघे धंसे थे। एक के ऊपर एक, नीचे से ऊपर तक। उन कंघों से लाल ऊन के चार गोले लटक रहे थे। जुपर (जूडा) में एक क्रम से रंगीन पंख लगे थे। गले में एक बनसुना (सजावटी गले का पट्टा जो कपडा और कौडियों से बनता है) पडा था।
लडकी को बाल संवारने की लत थी। बचपन से ही। वह अपनी सहेलियों के साथ एक खेल खेलती थी। उस खेल को वे लोग अटोई-मल-मल-करसाना कहते थे। आज भी खेलती है। खेल ही ऐसा है कि उसका मन हो आता है। खेल में वह अपनी सहेलियों के साथ अर्धचंद्राकर आकृति में खडी होती है। एक लडकी दाम देती है और एक पुकार लगाती है। पुकार लगाने वाली लडकी कहती है- मेरे बालों को मुलायम और सुंदर बना दो। दाम देने वाली लडकी दौडकर उसके पास जाती है और फटाफट उसके बाल संवारने लगती है। जब तक कि बाल संवरकर खूबसूरत न हो जायें। फिर बाल संवरवा चुकी लडकी दाम देती है और कोई दूसरी लडकी पुकार लगाती है। खेल तब तक चलता रहता है जब तक कि हर लडकी के बाल संवरकर सुँदर न हो जायें। लडकी आज भी यह खेल खेलती है। बार-बार खेलती है। गाँव में बाल संवारने में उसका कोई सानी नहीं।
जब वह बडी हुई तो गाँव के लडके उससे बाल संवारने की मनुहार करते। अक्सर वह मना कर देती। कभी कोई लडका उसके पीछे-पीछे चलता मनुहार करता, वह उसे देख मुस्कुरा देती। पर कभी कोई उसे भा जाता। वह उस लडके के बाल संवारती। युवा लडके लंबे बाल रखते। उनके लंबे बालों को वह करीने से काढती। पानी से उसे चिकना और सपाट करती। जिस लडके से उसे प्रेम होता उससे वह लकडी का कंघा माँगती। गाँव की परंपरा है, प्यार की बरसों पुरानी परंपरा कि कंघी लडका लाकर देगा। उसे महुआ कि मुलायम लकडी का कंघा पसंद था। प्रेमी के कमर में हाथ डाल उसकी आँखों के पार देखते हुए उसे बस यह ही चाहिए होता था। महुए की लकडी का कंघा। लडका जंगल-जंगल घूमता। महुए की मुलायम लकडी ढूँढता। कुल्हाडी से काटकर उसे लाता। इत्मिनान से कुल्हाडी की तेज धार से छीलकर लकडी को पतला करता। उसे काटता। दाँते बनाता, बेहद करीने से, मगन, आँखें गडाये....। कभी सोचता कि कंघे पर क्या निशान बनाये। कोई फूल, कोई पंछी, कोई जानवर या ऐसा ही कुछ और....कुल्हाडी की नोक से कंघे के ऊपरी सिरे को कुरेद-कुरेदकर कोई प्रतीक बनाता....। लडकी की जुलपिन में चार कंघे धंसे हैं, हर कंघे की एक कहानी है।
इस दुकान के बारे में उसे उसके नये प्रेमी ने बताया था।
‘ मुझे एक अच्छा सा कंघा बनाकर दो...।’
उसने उसके कान को अपने दाँतों में दबाते हुए कहा था। वह उसके सामने बैठा था पीठ किये और वह उसके बाल संवार रही थी।
‘ मुझे नहीं आता.....।’
‘ झूठ बोलते हो। तुम एक जवान लडके हो और तुम्हें कंघा बनाना नहीं आता...।’
‘उसके बदले तुम मुझे क्या दोगी। क्या तुम....?’
लडके ने उसकी ओर गर्दन घुमाकर, उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा। लडकी ने उसके कंधे पर अपनी ठोढी टिकाई और उसकी पीठ पर धौल जमाते हुए कहा- ‘धŸा....’। याने ‘ठीक है’।
इसी लडके ने उसे सुनार की इस दुकान के बारे में बताया था।
कोदरा उसे दुकान के भीतर ले आया। लडकी ने किसी करदान(करधन) नाम की चीज के बारे में सुना था। उसने यह भी सुना था कि वह सिक्कों से तैय्यार होती है। लडकी को सिक्के अच्छे लगते थे। दुकान में गिलेट के इतने सारे आभूषण देखकर वह चकित थी। उसने यह सब पहली बार देखा था। उसे करदान पहराते हुए कोदरा ने चुहल की थी। जुलपिन में धंसे चार कंघों को लेकर। लडकी खिलखिलाकर हँस दी। लडकी के पास पैसे नहीं थे। वह करदान नहीं खरीद पाई। खाली हाथ लौट गई। उसके जाने के बाद कोदरा एक पुराना गीत गाता रहा-
‘ बेटले मर्राटे पुँगार....पुए आन्टा....।’
(सूखे किर्राते पेड पर एक फूल खिला- एक कंघा)
(2)
कहते हैं एक दिन इसी सुनार के यहाँ एक सरकारी मुलाजिम आया था । वह पी.डब्ल्यू.डी. डिपार्टमेन्ट में सब इंजीनियर था। उसका नाम गजोधर पण्डा था। वह एक काम में सुनार की मदद चाहता था। सरकार जंगल में रोड बनाना चाहती थी। टार की रोड। मजबूत और लंबी रोड। इस काम के लिये उसे एक सुनार की जरूरत आन पडी थी। भला टार की रोड बनाने में सुनार का क्या काम ? पर काम ही कुछ ऐसा था, कि जरुरत आन पडी थी। काम कठिन था। खतरनाक भी। गजोधर पण्डा इस काम के लिए सुनार को मुँह माँगी कीमत देने को तैयार था।
‘‘राजा खत्म हो चुका है। ’’
गजोधर ने कहा। ठंड थी और वह भट्टी के पास कुर्सी पर बैठा था। सामने छोटे से कांच के बॉक्स में कुछ आभूषण लटके थे। वह उन आभूषणों को गौर से देख रहा था।
‘‘हाँ...श्श, श.. शायद ।’’
सुनार ने पहले कोदरा की तरफ देखा और फिर धीरे से फुसफसाते हुए, थोडा हकलाते हुए कहा । कोदरा भट्टी से थोडा दूर चटाई पर पैर सिकोडे बैठा था। सुनार को पता नहीं था कि राजा के मरने की बात कोदरा के सामने की जानी चाहिए या नहीं।
‘‘यह बात जो हम करने जा रहे हैं गुप्त रहनी चाहिये तुम्हारे और मेरे बीच। ’’
गजोधर ने फुसफुसाते हुए कहा।
‘‘बिलकुल ’’
‘‘तुम यहाँ नये हो। धीरे धीरे जान जाओगे कि बस्तर में कई बातें गुप्त रखनी पडती है। अगर बढिया पैसा कमाना चाहते हो तो बातों को गुप्त रखना सीख लो। ’’
‘‘लगता तो यही है। ’’
दोनों कोदरा की तरफ देखने लगे । कोदरा काम में मगन था। गजोधर ने सुनार को दुकान से बाहर चलने का इशारा किया।
‘‘अभी आता हूँ। दो कप चाय तैयार रखना।’’
सुनार ने कोदरा को कहा। दोनो दुकान के बाहर आ गये।
सब इंजीनियर गजोधर पण्डा ने सुनार को छोटी सी तस्वीर थमाई। एक ब्लैक एण्ड व्हाइट तस्वीर। तब रंगीन फोटो नहीं होती थी। फिर उस तस्वीर की ओर इशारा कर कहा -
‘‘तुम्हें यह बनाना है।’’
सुनार ने चलते-चलते वह तस्वीर देखी। तस्वीर को देखते-देखते उसकी चाल धीमी होती गई। तस्वीर पर आँख गडाये-गडाये उसकी चाल धीमे से और धीमे हो गई। तस्वीर पर जडवत आँखें जमाये वह रुक गया। उसका चेहरा भावविहीन हो गया था। फिर कुछ समांतर रेखायें उसके माथे पर उभर आईं। वह उस तस्वीर को देखता रहा। एकटक। बिना पलक झपकाये लगातार। उसके कान के ऊपर बालों में से पसीने की एक बूँद बहकर गर्दन की ओर लपकी। उंगलियां में थमी फोटो धीरे-धीरे कांपने लगी। तस्वीर को टकटकाती आँखें फैलकर चौडी हो गईं। गजोधर ने सुनार के कांपते हाथ पर अपना हाथ रख दिया। सुनार ने गजोधर की तरफ देखा। गजोधर ने अपने कंधे पर लटकते बैग को उतारा। इधर उधर देखा। आश्वस्त हो लेने के बाद उसने बैग में से नोटों की पाँच गड्डियां निकालीं। हडबडाते हाथों से उसने वे गड्डियां सुनार की पैण्ट की जेब में ठूँस दी। सुनार कभी गजोधर की ओर देखता तो कभी अपनी जेब की ओर। उसका दिल जोरों से धडक रहा था। बगलें पसीने से चिपचिपा आई थीं।
‘‘पचास हजार रूपये एडवांस। काम के बाद इतना ही और।‘
सुनार के लिए यह एक अकल्पनीय रकम थी।
‘‘...पूरी जिंदगी नहीं कमा पाओगे। डरो नहीं। बस यह ध्यान रखना कि यह बात किसी को पता न चले। यह कभी न भूलना कि हम बस्तर में हैं। इसका अंजाम मौत भी हो सकता है। ‘‘
गजोधर चला गया। सुनार दुकान लौट आया। कोदरा दो कप चाय बना लाया था। सुनार ने चाय नहीं पी। उसने कोदरा को गौर से देखा। उसने सोचा कि कोदरा के बिना वह यह काम कर नहीं सकता। उसे जल्द ही कोदरा को इस काम के बारे में बताना था। पर कैसे ? वह कैसे कोदरा को बता सकता है कि उसे यह काम करना है ? कैसे बतायेगा वह ? किस तरह ? रात भर वह यही सोचता रहा। इतना तय था कि कोदरा को यह बात बताना या नहीं बताना सिर्फ और सिर्फ एक बात पर निर्भर करता था। और वह बात यह थी कि कोदरा बस्तर के राजा के बारे में क्या सोचता है ? क्या वह मानता है कि बस्तर का राजा जिंदा है ? ठीक उसी तरह जिस तरह जंगल के तमाम लागे मानते हैं कि राजा मरा नहीं। वह मर नहीं सकता। राजा को मारने वाले हथियार पानी हो जाते हैं। क्या वह भी यही मानता है ? पर अगर वह ऐसा नहीं मानता है तो ? इतना तय था कि अगर वह यह मानता है कि राजा मर चुका है, तो निश्चय ही यह काम कोदरा से नहीं करवाया जा सकता है। वह सुनिश्चित होना चाहता था।
‘‘ राजा जिन्दा है। हर कोई मानता है, है न...। ’’
सुनार ने कहा। कोदरा अपने काम में लगा था। काम लगे लगे ही उसने सुनार की बात सुनी।
‘‘राजा कभी मरता नहीं। वह बस शक्ल बदल लेता है। राजा अमर है। जो हथियार राजा को मारने उठता है, वह पानी बन जाता है। जो व्यक्ति राजा को मारने उस पर हमला करता है, वह कोढी हो जाता है। जो राजा के बारे में अनिष्ट सोचता है उसका नष्ट होना तय है। राजा को मारा नहीं जा सकता। वह अजेय है।‘‘
कोदरा ने अपनी जबान में कहा। कोदरा यह बात किसी और जबान में नहीं कह सकता था। कहते कहते वह शांत हो गया था। उसका हाथ थम गया था। भट्टी का पंखा रूक गया था।
‘‘यह काम छोडो कोदरा । हमें एक बडा काम करना है। ’’
‘‘वह क्या ? ’’
कोदरा ने उत्सुकता से सुनार को देखा । सुनार ने वह तस्वीर उसके सामने सरका दी।
कोदरा ने पल भर को तस्वीर देखी। वह थोडा पीछे सरक गया। फिर घुटनों के बल बैठकर आँख बंद की। थोडी देर कुछ बुदबुदाया। फिर उस फोटे के सामने अपना सिर टिका दिया। फिर उठा। हतप्रभ। किंकर्तव्यविमूढ़।
‘‘तुम्हें तो खुश होना चाहिये कि राजा ने अपना इतना महत्वपूर्ण काम मुझे और तुम्हें सौंपा है। यह सौभाग्य है। यह राजा का चयन है। राजा का आदेश है कि मैं और तुम यह काम करें।’’
लडके ने उस फोटो को देखा। अपनी जबान से सिर्फ इतना कहा - हे देव शक्ति दे।
‘‘हमें यह काम गोपनीय रूप से करना होगा। इस तरह की किसी को पता न चले। राजा की इच्छा है कि कोई न जाने कि यह काम किसने किया।’’
‘‘बिल्कुल । ’’
कोदरा ने ढृढता से कहा।
रात को सुनार के हाथ एक पुराने अखबार की कतरन लगी। उसमें बस्तर के राजा की हत्या की खबर थी। लिखा था कि किस तरह महल में गोली चालन हुआ। किस तरह लोग मारे गये। किस तरह यह पता चला कि राजा भी मारा गया। कि राजा अब खत्म है।
जो तस्वीर गजोधर ने सुनार को दी थी उसमें राजा का राजदण्ड बना था। काकातीय वंश का राजदण्ड जो बस्तर के राजा का प्रतीक था। जो हमेशा राजा के साथ रहता था। जो पवित्र था । जंगल में पूज्य था।
सुनार को गजोधर की बात याद आई, जाते-जाते उसने कहा था- इसमें कोई रिस्क नहीं। हर कोई तो मानता है कि राजा मरा नहीं....।
हाथ में पेपर की कतरन पकडे सुनार के माथे पर पसीने की बूँदें उग आईं। उसने पेपर की कतरन को चिंदी-चिंदी करके खिडकी के पार फेंक दिया। लोटा भर पानी पिया। लालटेन की रौशनी को मद्धम किया और सोने की कोशिश में बिस्तर में घुस गया।
सुनार ने चैन की साँस ली, कि कोदरा मानता है कि राजा जिन्दा है। कि राजा मर नहीं सकता। कि राजा को राजदण्ड बनवाना है।
दुबारा जब सब इंजीनियर गजोधर आया तब तक राजदण्ड तैयार हो चुका था। लाइट गुल थी। कोदरा गाँव गया हुआ था। सुनार ने लालटेन की रोशनी में गजोधर को वह राजदण्ड दिखाया था। हूबहू वही। उतना ही ऊँचा। नीचे से ऊपर तक वलयाकार चाँदी की पट्टियाँ । सबसे ऊपर राजवंश का प्रतीक चिन्ह। खूबसूरत अलंकृत बेलें। ऊपर दो वलयों में कीमती पत्थरों की कतार। उतना ही वजनी। यह बात दीगर थी कि यह ठोस चाँदी का नहीं था, बल्कि इसके भीतर मिट्टी भरी थी। पर दीखता बिल्कुल वैसा ही था। सुनार लालटेन की आभा में गजोधर को उसका मुआयना करा रहा था। सूत-दर-सूत। सब कुछ वैसा ही।
जाते जाते गजोधर बाकी के पचास हजार भी सुनार को दे गया।
अगले दिन गजोधर अपने बॉस से मुखातिब था।
‘‘सर राजदण्ड बन चुका है। अब रोड का काम शुरू करवा दिया जाये।’’
बॉस ने हामी भर दी।
विशु को आज भी याद है उस रोड का बनना।
गाँव में चर्चा थी, कि जिस रास्ते से बस आती है, वह रास्ता अब पक्का होने जा रहा है। सरकार उसको टार रोड बना रही है। शशांक विशु को बताते कि अब बस के रास्ते का रंग सलेटी हो जायेगा। पूरा रास्ता सलेटी । जिस रंग की लिखने वाली स्लेट होती है न उसी रंग का। लाल-धूसर रास्ते पर चिकना टार बिछाया जायेगा। लाल-धूसर सलेटी के नीचे दफन हो जायेगा। बजरी की जगह एकसार सलेटी चिकनापन होगा। झाडियों, सूखे ठूठों, हरे-भरे दरख्तों को उखाडकर फेंक दिया जायेगा। इस तरह धूल उडाने वाला रास्ता खत्म हो जायेगा। सबसे मजेदार बात तो यह है कि रोड बनते समय रोड रोलर आयेगा । शशांक ने विशु को रोड रोलर के बारे में विस्तार से बताया था। उन भट्टियों के बारे में भी जिनमें टार पिघलाया जाता है। विशु खासा उत्साहित था।
गाँव में सिर्फ दो ही पढे-लिखे लोग थे। एक शशांक और दूसरा एक डॉक्टर जो बहुत दूर से आया था। डॉक्टर का नाम राजू था। उसका मूल नाम कुछ और था पर वह हर किसी को अपना नाम राजू बताता था। सिर्फ राजू। राजू के आगे कुछ भी नहीं। वह कोई सरकारी डॉक्टर नहीं था बल्कि खुद ही बस्तर के इस बियावान जंगली इलाके में रहने चला आया था। शशांक की डॉॅक्टर उर्फ राजू से दोस्ती थी। विशु ने एक बार अपने पिता को डॉक्टर से यह कहते सुना था कि बताओ भला इस पूरे इलाके में कौन है सिवाय उनके और डॉक्टर के जो यह मान सके कि राजा सचमुच में मर चुका है। शशांक ने दो तीन बार डॉक्टर से कहा था कि ‘‘बोलो बोलो कोई है, जो मान पायेगा कि राजा खत्म है।’’ डॉक्टर उदास हो गया था। कहने लगा - ‘‘दुनिया कितनी आगे बढ गयी और जंगल कितने पीछे छूट गये। पता नहीं कभी कोई जंगल की चिंता पालेगा भी या नहीं। जो पिछड जाता है लोग उसे भूल जाते हैं। कहीं लोग इस जंगल को भूल न जायें। मान न बैठैं क्या ऐसा भी जंगल था। इतना विलग। खुद में इतना मगन।’’
शशांक को डॉक्टर अजीब सा लगता। डॉक्टर या तो उदास रहता या खूब खिलखिलाकर हँसता। उसकी बात से ऐसा लगता था, कि वह जंगल के लिये कुछ करना चाहता है। पर क्या ? यह ठीक ठीक पता नहीं था।
विशु को वह दिन याद है जब रोड बनाने का हलकारा गाँव आया था। कहते हैं जंगल में कहीं भी रोड तब बनती थी जब राजा रोड बनाने का आदेश देता था। अपने दौर में अंगरेजों ने भी रोडें बनवाईं। पर राजा, राजा हर दौर में सडकें बनवाता रहा। भारत की स्वतंत्रता के बाद सरकारें भी रोड बनाने लगी थीं । पर लोग सरकार के इन कामों के बारे में नहीं जानते थे। जंगल में बहुत कम लोग यह जानते थे कि रोड बनाने का काम राजा के अलावा कुछ और लोग भी करवाते हैं। राजा का आदेश एक लंबे कागज पर सुनहरी स्याही से लिखा होता था। गाँव की थाना गुडी में चौकीदार राजा की आज्ञा को पढकर गाँव के लोगों को सुनाता था। फिर राजदण्ड आता था। कहते हैं राजा ने महल से बाहर जाना बंद कर दिया था, सो राजा की जगह उसका राजदण्ड भेजा जाता था। राजदण्ड के आने की पहले से सूचना होती। गाँव-गाँव में खबर होती कि राजदण्ड आ रहा है। राजा का आदेश सर्वोपरी था। लोग आदेश का पालन करते थे। वे बडी से बडी संख्या में आते और रोड बनाने का काम शुरू कर देते । उन्हे यह काम श्रमदान के रूप में करना पडता था। राजा पब्लिक के काम में पैसे नहीं देता था। सामग्री पर जो खर्च होता वह राजकोष से उठाया जाता। पर श्रम के लिये पैसे देने का रिवाज नहीं था। लोग स्वस्फूर्त राजा की आज्ञानुसार काम करते थे। मुफ्त में करते ।
उस दिन भी राजाज्ञा आई थी। गाँव में थानागुडी के चारों तरफ जंगल के हजारों लोग इकट्ठा थे। जहाँ देखो वहाँ बस जंगल के लोग। जंगल के पुरुष। जंगल की स्त्रियाँ। कई लोग पूरे परिवार के साथ आये थे। किशोर और बुजुर्ग भी थे। स्त्रियों का एक झुण्ड जिसे चौकीदार ने थानागुडी के पास बुला लिया था, सज धज कर आया था। वह जनजातीय गीत गा रहा था। लोगों के शोर में कभी-कभी उनका गीत सुनाई देता। लगातार बढते शोर के बीच उनकी मद्धम आवाज सुनाई देती। लोग कह रहे थे कि गाँव में पहली बार राजा की आज्ञा आई है। बुजुर्ग इस बात को तस्दीक कर रहे थे। वे बता रहे थे कि यह पहली बार है इससे पहले यह कभी नहीं हुआ। लोग उत्साहित थे। अचंभित भी। कुछ लोग भावुक हुये जा रहे थे। कहते हैं सब इंजीनियर गजोधर ने बडी लगन और मेहनत से इस नकली राजाज्ञा को तैयार करवाया था। लंबे कागज पर सुनहरी स्याही से एक-एक शब्द उसने अपनी निगरानी में लिखवाया था। उसी तरह जिस तरह वह राजाज्ञा में लिखा होता था। फिर अंत में राजा की नकली मुहर और राजा के नकली हस्ताक्षर अंकित करवाये।
डॉक्टर राजू भी वहाँ पहुँच गया था। वह चुपचाप खडा था। वह गीत गाती जनजातीय लडकियों के पास खडा था। जब चौकीदार थानागुडी के चबूतरे पर चढ़ा भीड़ का शोर बढ गया। चारों ओर राजा की जयजयकार के स्वर सुनाई देने लगे । फिर जब चंद पलों बाद लोगों का शोर थोडा कम हुआ चौकीदार राजा की आज्ञा पढकर सुनाने लगा। राजा की आज्ञा पढते-पढते वह यह भी बताने लगा कि शाम तक राजदण्ड आ जायेगा। यह सुनकर शोर फिर बढ गया। कुछ लोग तो लगभग चिल्लाने लगे। स्त्रियों की आँखों में आँसू आ गये। बहुत से बुजुर्गों ने आँखें बंद कर हाथ जोड लिये।
पता नहीं डॉक्टर राजू को क्या हो रहा था ? उसका मन क्रोध और दुःख से भरा जा रहा था। वह अचानक मंच पर चढ गया। क्षण भर को उसने दूर तक फैले जन सैलाब पर नज़र डाली। दूर-दूर तक जहाँ तक नजर जाती लोग ही लोग दिखाई देते। उसका दिल जोरों से धडक रहा था। बोलने से पहले वह रुका। उसने थूक गटकी। फिर जंगल की जबान में कहने लगा -
‘‘ ....यह सब जो हो रहा है, फ़रेब है। लोगों की चालबाजी है। वे तुम सबसे मुफ्त में काम करवाना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने राजाज्ञा का सहारा लिया है। यह राजाज्ञा नकली है। जंगल को लूटने की नीति का एक हिस्सा है। यह हम सबका अपमान है। एकदम गलत है...।’’
भीड से आने वाली आवाजें थोडा थम गई थीं। कुछ लोग भौंचक से डॉक्टर राजू को ताकने लगे। डॉक्टर राजू की हिम्मत बढ गई। वह वह सब कह देना चाहता था, जो उसके मन में था। पर जानता था कि यह सब एकदम से कहा नहीं जा सकता था। उसने तरकीब सोची, कि कहाँ से कैसे शुरु करे, पर एक अजीब सी उत्तेजना उस पर तारी थी। वह कल रात भर नहीं सोया था। पूरी रात यह सब सोचता रहा था। बारामदे में भटकता रहा था वह पूरी रात। खुद से बात करता। इतना मगन कि एक बार उसने आवेश में आकर टेबिल पर मुक्का जड दिया। बियाबान जंगल में उसके उस एकांतिक घर से दूर-दूर तक सिर्फ और सिर्फ जंगल ही थे। रात थी और सागौन के सन्नाते पेडों की छायायें डोल रही थीं। उसने जोर-जोर से गालियाँ दीं। उसकी आवाज जंगल में बहुत दूर तक सुनाई दी। पेड सन्नाते रहे, आकाश पर तारों से आँख मिचौली खेलते बादल सरकते रहे। सागौन की फुनगियों पर चाँद उगा था, सफेद बादलों में समाने को आतुर सा। डॉक्टर राजू ने चाँद के चारों ओर खिंचे सफेद वलय को देखा, जंगल की ठण्डी सागौन वाली गंध उसके फेफडों में भर गई, पŸां से लदी-फदी डाल पर हवा में लचकती चाँदनी को उसने पल भर को देखा.....गालियाँ बकते हुए उसने एक तरफ थूक दिया....।
‘‘ हर काम की कीमत होती है। हर श्रम का वाजिब मूल्य। पर कुछ लोग कीमत नहीं देना चाहते। वे जो लुटेरे हैं, षोषक हैं, आततायी हैं। जो गरीब के हिस्से को मारना चाहते हैं। यह समझना जरुरी है.....।‘‘
वह यह सब कहते-कहते खासा उत्तेजित हो गया। वह बताने लगा कि कैसे और क्यों राजाज्ञा नकली है। बताने लगा कि नकली राजाज्ञा बनाना कितना आसान है। फिर वह वह कहने लगा जो कहना बहुत कठिन था। जिसके लिए अदम्य साहस की जरुरत थी।
‘‘ .... जब राजा ही नहीं है, तो राजाज्ञा कहाँ से आ जायेगी। भारत में प्रजांतत्र आ चुका है। सरकार काम कर रही है। राजा तो कबका मर चुका है। राजा की हत्या हो चुकी है । इस सत्य को जानना होगा। जानना होगा कि अब कोई राजा नहीं । अब जो यह काम हो रहा है यह सरकार कर रही है। राजा नहीं। अरे जब राजा खत्म हो गया, तो उसकी राजाज्ञा कहाँ से आयेगी।’’
डॉक्टर राजू को सुनते सुनते भीड एकदम से शांत हो गई । चारों ओर चुप्पी सी छा गई । जंगल के लोगों को डॉक्टर राजू की बातें समझ नहीं आईं। वे बातें बेहद अबूझ थीं। पर राजा के मरने की बात....., हर कोई एक दूसरे को ताकने लगा। एक बुजुर्ग डॉक्टर को गंदी-गंदी गालियाँ और श्राप देने लगा। उसके साथ कुछ और लोग भी गालियाँ देने लगे और फिर पूरा हुजूम शामिल हो गया। चारों ओर कुहराम मच गया। कुछ लडके मंच पर चढ आये। उन्होंने डॉक्टर राजू को थानागुडी से नीचे खींच लिया। कुछ ने उसके कपडे फाड दिये । एक आदमी ने उसके बाल पकड लिये और भीड से बाहर ले जाने लगा। लोग डॉक्टर को गाली दे रहे थे, चिल्ला रहे थे - ‘‘मारो। मारो। राजा का अपमान करता है। यह दैत्य है। इसको खत्म कर दो।’’ लोग डॉक्टर राजू पर पिल पडे थे। लात घूसों से आदमी और औरतें पिटाई कर रहे थे। दो लोगों ने उसे पकड रखा था। पर डॉक्टर के सिर पर भी मानो पागलपन सवार था। डर और लात घूसों के बावजूद वह लगातार कह रहा था ‘राजा मर चुका है। राजाज्ञा झूठी है। फरेब है यह सब।‘ लोग उसे पीट रहे थे। अचानक वह खुद को उनसे छुडा पाने में सफल हुआ और भाग खडा हुआ। भागते भागते भी वह चिल्लाता जा रहा था - ‘‘ झूठ है राजाज्ञा। खत्म है राजा। ’’ लोगों ने उसे पत्थर फेंककर मारा। कुछ लोग पत्थर उठाकर उसके पीछे भागे। वह बचता-बचाता भागता गया। झाडियों और पेडों की ओट से। खुद का सिर बचाता। लगातार दौडता वह भागता गया। एक पत्थर उसकी पीठ पर लगा और एक कंधे पर । वह गिरता पडता, जंगल के भीतर घुस गया और भागता रहा।
विशु की माँ ने कपडे धोये थे और आंगन में कपडे सुखा रही थी। तभी आंगन के दरवाजे पर उन्हें डॉक्टर राजू का कातर स्वर सुनाई दिया। घबराया और डरा हुआ स्वर और फिर लगातार दरवाजा पीटने की आवाज । विशु की माँ डर गयी। शशांक घर में नहीं थे। दरवाजा पीटने के साथ-साथ डॉक्टर की कातर आवाज लगातार आ रही थी। विशु की माँ ने एकदम से दरवाजा खोला, डॉक्टर को भीतर किया और दरवाजा बंद कर दिया। डॉक्टर को देखकर वे चीख पडीं। डॉक्टर के कपडे फटे थे। मुँह और सिर से खून निकल रहा था। धूल धूसरित शरीर पर घाव के निशान थे। चेहरे पर लाल लाल खरोंच के निशान थे। वह बेहद डरावना लगा रहा था। वह कराह रहा था। उसको देखकर विशु डर गया था। वह माँ से चिपककर जोर जोर से रोने लगा। बाद में शशांक भी आ गये थे। शशांक ने डॉक्टर को बिस्तर पर लिटाया। विशु की माँ गरम पानी से उसके घाव धोने लगे।
थानागुडी में हंगामा मचा हुआ था। शाम तक राजदण्ड आना था। लोग राजदण्ड पर तर्पण करने के लिये मुर्गे, बकरे और दारू ले आये थे। शाम का धुँधलका होते होते राजदण्ड आया। चार लोग उसे अपने कंधे में ढ़ोकर लाये थे। साथ में गजोधर भी आया था। देर रात तक राजदण्ड की पूजा और तर्पण चलता रहा।
डॉक्टर राजू ने शशांक को उसके घर से फर्स्ट एड का बॉक्स लाने को कहा। अपनी पैण्ट से चाबी का एक गुच्छा निकाला और उसमें से एक चाबी शशांक को दे दी। शशांक डॉक्टर राजू के घर की तरफ चल दिये । डॉक्टर राजू का घर दो कमरों का था। सामने वाले कमरे में उसकी दवायें, किताबें और बिस्तर लगा रहता था। पीछे का कमरा बंद रहता। उसमें हमेशा ताला लगा रहता। डॉक्टर राजू शशांक को चाबी देते समय सतर्क था। उसने बडे ध्यान से सिर्फ सामने के कमरे की चाबी गुच्छे से निकाल कर दी। शशांक को यह बात थोडी अजीब लगी। यूँ शशांक को डॉक्टर की कई बातें अजीब लगती थीं।
शशांक को फस्ट एड बॉक्स टेबल के ऊपर ही मिल गया था। बॉक्स पर लाल रंग का क्रॉस बना था। बॉक्स के साथ टेबल पर एक किताब रखी थी । लाल रंग की एक किताब जिस पर काले रंग से एक स्कैच बना था। छोटी छोटी आँखों वाले किसी प्रभावपूर्ण आदमी का चित्र। किताब के ऊपर किताब का शीर्षक लिखा था - ‘फॉर ए न्यू डेमोक्रेसी’। शशांक ने क्षण भर को किताब को उलटा पलटा। फिर सोचा कभी डॉक्टर से ले लेंगे। फुर्सत से पढने को। विशु की माँ और शशांक ने डॉक्टर की मरहम पट्टी की और उसे इत्मिनान से आराम करने की हिदायत दी। पर डॉक्टर बैचेन था। उसने शशांक से कहा कि उसे एक पत्र लिखना है। चूँकी वह लिख नहीं सकता । अतः वह बोलेगा और शशांक लिखेंगे। शशांक ने उसे आराम करने को कहा। पर वह नहीं माना। वह कहता गया और शशांक पत्र लिखते गये -
‘‘..... आपके समाचार पत्र के लोगों को एक बार इस गाँव आकर इस घटना की रिपोर्टिंग करनी चाहिये। जो राजा मर चुका है, उसे जिंदा बताकर कैसी तो लूट यहाँ हो रही है। सड़क का काम जंगल के लोगों से करवायेंगे। राजाज्ञा के नाम पर। जंगल के लोग मुफ्त में काम करेंगे। सरकार के लोग फर्जी मस्टर बनायेंगे और लेबर का सारा पैसा खा जायेगें। यह एक महत्वपूर्ण खबर है। कम से कम आपके समाचार पत्र से तो अपेक्षा है, कि बडे शहरों और राजनीति के अलावा भी अन्य बातों को जगह दें। यह ठीक है कि यहाँ पहुँचना कठिन है। बेहद मुश्किल । पर यह जोखिम तो उठाना होगा......।‘‘
डॉक्टर ने शशांक को कहा कि दो चार दिन बाद बस आयेगी। बस का कंडेक्टर उसका परिचित है। शशांक अगर कंडेक्टर को यह पत्र दे दें तो वह लौटते वक्त बीच के जिस भी बडे़ गाँव में सबसे पहले पोस्ट बॉक्स मिलेगा, उसमें यह पत्र डाल देगा। शशांक थोडा डरे हुये थे। उन्हें लगा कि इस पत्र से कहीं और दूसरा बखेडा न खडा हो जाये। फिर समाचार पत्र से क्या असर होगा ? गाँव में एक तो कोई समाचार पत्र आता नहीं। सिर्फ दो-तीन रेडियो हैं। बस का कंडेक्टर जब आता है तब डॉक्टर के लिये पिछले दस पंद्रह दिनों का समाचार पत्र ले आता है। जिसे पढने वाला इस पूरे इलाके में उनके अलावा और कोई नहीं। खबर छाप भी दे तो भी क्या होता है ? क्या जंगल मानने लगेगा कि राजा मर चुका है। बस्तर के तमाम पेपरों में आया कि राजा खत्म हो चुका है, पर क्या लोगों ने मान लिया कि राजा मर चुका है ? शशांक को लगा कि पत्र भेजने से कहीं मुसीबत बढ़ न जाये। सारा काम सरकार करवा रही है। पत्र भेजने का मतलब होगा सरकार के लोगों से दुश्मनी। अभी तो जंगल के लोग ही डॉक्टर के पीछे पडे हैं। कल को सरकार के लोग भी पड जायेंगे। विशु की माँ भयभीत थीं। वह डॉक्टर को डॉक्टर के घर भेजने को राजी नहीं थीं। उसे लगता था कि वे लोग फिर से आ जायेंगे। डॉक्टर का घर सबको पता है। वे वहाँ आसानी से डॉक्टर को ढूढ़ सकते हैं। डॉक्टर की तबियत भी ठीक नहीं। उसे निश्चय ही कुछ दिनों तक यहीं रहना चाहिये। हमारे घर में । डॉक्टर विशु की माँ की बात मान गया।
शशांक ने वह पत्र नहीं भेजा।
‘‘पत्र चला गया।’’
‘‘हाँ। ’’
शशांक ने डॉक्टर राजू की आँखों में आँख डालकर झूठ बोला।
‘‘कण्डक्टर आया क्या पेपर लेकर?’’
‘‘पता नहीं आता होगा ?’’
‘‘पता करो। देखो यह बहुत जरूरी है।’’
डॉक्टर लेटे से उठ गया । शशांक ने बात बदल दी।
‘‘तुम्हारी टेबल पर एक किताब देखी।‘‘
‘‘कौन सी, कौन सी ?’’
डॉक्टर चौंका। मानो उसकी कोई चोरी, पकडी गई हो।
‘‘फॉर ए न्यू डेमोक्रेसी।’’
डॉक्टर ने कुछ नही कहा। बस अवाक सा शशांक को देखता रहा।
‘‘क्या वह किताब तुम मुझे पढने दोगे ?’’
डॉक्टर ने हामी में धीरे से गरदन हिलाई।
‘‘उस पर छोटी छोटी आँख वाले एक आदमी का चित्र बना है। कौन है वह ?‘‘
‘‘ उसका नाम माओत्से तुंग है। हम सब उसे माओ कहते हैं । ’’
‘‘माओ...?’’
शशांक ने पहली बार यह नाम सुना था। डॉक्टर ताड गया कि शशांक नहीं जानता। उसके चेहरे पर सुकून का भाव उतर आया। न जानने पर या तो वह सुकून करता या एकदम से उखड जाता- ‘‘इतना भी नहीं जानते....लानत है।’’ एक नकली मुस्कान डॉक्टर के चेहरे पर तिर गई। उसने बात बदल दी।
‘‘भाभी । एक कप चाय मिलेगी।’’
(3)
विशु को उस सडक का बनना याद है।
शशांक अक्सर साइकिल पर बैठाकर उसे रोड रोलर दिखाने उस रास्ते पर जाते थे। विशु ने तब साइकिल के पीछे कैरियर पर बैठना सीखा ही था। उसकी माँ चितिंत रहती कि कहीं वह गिर न पडे । साइकिल की सीट के नीचे लगी लोहे की एक रॉड को पकडे वह कैरियर पर बैठा रहता। सीट के नीचे स्प्रिंग में एक बार उसकी उंगली दब गई थी। तब से वह स्प्रिंग के नीचे लगी उस रॉड को मजबूती से पकडकर कैरियर पर दोनों तरफ पैर लटकाकर बैठ जाता था। शशांक साइकिल चलाते और वह पीछे बैठा रहता। शशांक बीच बीच में टोकते कि पैर पहियों से दूर रखना। वह अपने पैर दोनों तरफ पहियों से दूर फैला लेता। रोड रोलर देखने के लिये वे बहुत दूर तक जाते । वहाँ जहाँ रोड का काम चल रहा होता।
उन दिनों भाप से चलने वाले रोलर होते थे। वे बहुत धीमे चलते थे। उनके ऊपर से भाप निकलती थी। एक बार में बहुत सारी भाप। उसके एक तरफ ऊँचा सा लोहे का पाइप होता था, जो रोड रोलर की मशीनों के बीच से शुरु होकर बहुत ऊपर तक उठा होता। उसमें से भाप का बादल एक झटके से निकलता था। ऊपर तक उठता भाप का बादल फैलकर आकार में बडा होता जाता। सफेद सलेटी बादल, जिसकी छाया जमीन पर पडती। जैसे ही बादल निकलता विशु उसे एकटक देखता। धीरे-धीरे जंगल के ऊपर से उठते बादल को देखता वह चहकता। पेडों के बीच से ऊपर को उठते बादल को देखकर मुस्कुराता। ऊपर उठकर हवा में विलीन होते जाते बादल को वह गौर से देखता। विशु यह मानता कि बादल रोड रोलर से निकलते हैं। रोड रोलर से निकलकर वे आकाश की ओर उठते हैं। आकाश में फैलते जाते हैं। इस तरह आकाश बादलों से भर जाता है। रोड रोलर पीले रंग का था। लाल धूसर मिट्टी और कीचड के कारण उसका रंग पीले से मटमैला लाल हो गया था। वह थोडी-थोडी देर बाद सीटी बजाता था। कभी वह लंबी सी एकसार तेज सीटी बजाता तो कभी कंपकंपाती रुक रुककर। विशु ने पहली बार ऐसी सीटी सुनी थी। उसकी सीटी की आवाज सुनकर वह चौंक जाता। फिर शशांक की ओर देखता और लजाता सा मुस्कुराता। रोड रोलर के विशाल रोलर घडघडाते हुये शशांक और विशु के पास से गुजरते। शशांक साइकिल को हैण्डल से थामे खडे रहते और विशु साइकिल के पीछे के कैरियर पर बैठा रहता। रोलर की घरघराहट उनके पास आती धीरे-धीरे लगातार बढती हुई। जमीन का कांपना धीरे-धीरे बढता। फिर साइकिल में उसका कंपन महसूस होता। धीरे-धीरे बढता हुआ। लगता साइकिल के पहिये, हैंण्डल, कैरियर, मडगार्ड...सभी काँप रहे हैं और उनका काँपना बढ रहा है। एक गुदगुदाता सा कंपन विशु की छाती में होता और उसके सामने से विशाल रोलर धीरे-धीरे सरकता । एकदम सामने। छाती का कंपन बढ जाता और विशु खुशी के मारे चीखना चाहता। पर आसपास तमाम लोगों को देखकर सिर्फ मुस्कुराकर रह जाता। रोलर धीरे-धीरे सामने से गुजर जाता। कंपन धीरे-धीरे कम होता जाता। दूर जाते रोलर को विशु गौर से देखता। वह धीरे-धीरे दूर सरकता जाता। जमीन का कांपना कम से कमतर होता जाता। बहुत दूर जाकर रोलर रुक जाता और फिर वापस लौटता।
रोड रोलर का ड्राइवर विशु और शशांक को जानने लगा था। अपने बेटे को रोड रोलर दिखाते पिता को वह कई दिनों से देख रहा था। उसने शशांक को एक बार कहा था कि वह विशु को रोड रोलर में बैठा भी सकता है। शशांक ने विशु की माँ को यह बात बतायी। विशु की माँ डर गई । उसने विशु को अपनी बाहों में खींच लिया। कहने लगीं कहीं यह गिर पडा तो। उसके बाद से रोड रोलर पर बैठने की बात आई गई हो गयी। रोड रोलर का ड्राइवर विशु को देखकर हाथ हिलाता। उसे देख विशु मुस्कुराता। ड्राइवर हँस देता।
रोड के दोनों तरफ हजारों की संख्या में जंगल के लोग काम करने में जुटे रहते। दोनों तरफ बस लोग ही लोग। कुछ लोग आग की भट्टी में डामर पिघलाने का काम कर रहे थे तो कुछ लोग पिघले डामर को रोड पर उंडेलने का । उन लोगों ने कोमल टहनियों और पत्तों को अपने पैरों में सुतली से बांध रखा था। उनकी देह पर नाममात्र के कपडे थे। ज्यादातर मर्द सिर्फ एक लंगोट लगाये थे। विशाल भट्टी में काला डामर खदबदा रहा था। आग और अंगार के ढेर के ऊपर लोहे की बेलनाकार भट्टी रखी थी। पिघलकर जमा काले डामर के थेगडे भट्टी पर जमा थे। भट्टी के ऊपर दो काले गड्ढे थे जिनमें से अनवरत काला तेलहा धुँआ निकल रहा था। भट्टी ऊपर तक खदबदाते डामर से भरी थी। भट्टी से छिटककर डामर रोड पर गिर रहा था। भट्टी में काम करने वाले लोग रोड पर गिरे उसी तपते गर्म डामर पर खडे-खडे अपना काम कर रहे थे। कुछ ने डामर से अपने पैरों को बचाने के लिए घुटनों-घुटनों तक पत्तों और टहनियों को बाँध रखा था। वे अपने सर पर डामर के छोटे ड्रम उठाकर लाते थे। उन्हें उसे लुढकाकर लाने की मनाही थी, क्योंकि इससे डामर बिखर सकता था। कुछ औरतें सर पर डामर उठाये भट्टी के पास कतार में खडी थीं। रोड के पार एक जगह डामर के छोटे ड्रम रखे थे। उनके बहुत पीछे रोड के किनारे कुछ लोग बडे ड्रमों से डामर छोटे ड्रमों में डाल रहे थे। पत्थरों को जमाकर बडे बडे भट्टे तैय्यार किये गये थे। इन भट्टों में इन बडे ड्रमों को गर्म किया जाता था। आदमी लोग अपने हाथों से इन ड्रमों को गर्म भट्टी पर रखते थे। आग में तपकर गर्म हो चुके पत्थरों पर वे अपने हाथों से बडे करीने से बडे -बडे ड्रम रखते।
जब बडे ड्रमों में डामर पिघल जाता तब इन्हें वे लोग पŸां वाली टहनियों में लपेटकर उसे पकडकर छोटे ड्रमों में उलटते। अक्सर उनके हाथ जल जाते। उनमें से कइयों के हाथें पर पट्टियाँ बंधी थीं। कुछ के हाथों में कुहनी तक जले के घाव बन आये थे। एक आदमी के हाथ की करीब दो बीता खाल उधड़ चुकी थी और भीतर का लाल मांस और रक्त दीख रहा था। पर फिर भी वह काम में भिड़ा हुआ था। एक दिन पहले सर पर गर्म ड्रम ढ़ो रही औरत के हाथ से ड्रम छिटक गया था। गर्म डामर उसके आधे शरीर पर और बाकी जमीन पर गिर गया था। उसका चेहरा, हाथ और छाती जल चुकी थी। वह औरत आज भी वहाँ थी। रोड के किनारे कुछ लोगों ने तनों को खड़ा कर उस पर बोरा डालकर छाया कर रखी थी। वह औरत उसी छाया में पडी कराह रही थी। उसके एक बच्चा भी था, जो उसके पास बैठा रो रहा था। थोडी देर बाद वह औरत दर्द के मारे चीख चीखकर रोने लगी थी। औरत की चीख का कहीं कोई असर नहीं था। रोड बनने का काम आबाध गति से चल रहा था। एक जगह आदमी और औरतें गर्म तारकोल में गिट्टी मिला रहे थे। वहाँ भयानक तपिश थी। लगता था जैसे कितनी भयानक आग लगी हो। पिता के साथ दूर से खडे़ होकर विशु ने उन भट्टियों को देखा था। उन सबसे काला धुँआ निकल रहा था। काम करने वाले लोगों का हूजूम उन भट्टियों के गिर्द इकट्ठा था।
चारों ओर अजीब सा शोर था। तेजी से काम करने के लिए ठेकेदार के लोग चिल्ला रहे थे। डामर सर पर रखे औरतों को कतारबद्ध करने के लिए धकियाता ठेकेदार का आदमी, भट्टियों के चारों ओर धुँयें में समाया हुआ किशोरों का एक झुण्ड जो आग जलाये रखने के लिए उसमें लकडी और कैरोसिन डाल रहा था, रोड के किनारे किनारे उकडू बैठे हजारों लोग जो काम पर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे औरतें, किशोर, जवान और बूढे.....अर्धनग्न और आतुर। ऐसा काम उन्होने पहली बार देखा था। भट्टियाँ और रोड रोलर एक बिल्कुल नई चीज थी। बड़ी अजीब चीज था डामर। आग में पिघलता और फिर जमता जाता। वे हतप्रभ थे। वे जलते, घायल होते, पिटते, कई-कई दिनों तक भूखे रहते, पास के तालाब का गंदा पानी पीते, बीमार पडते....पर फिर भी रात दिन भिडे रहते।
ठेकेदार काम को जल्द खत्म करना चाहता था। उसे भय था कि कहीं किसी को सच्चाई का पता न चल जाये। जंगल में सच का पता चलने में दशकों बीत जाते थे। पर फिर भी उसे भय था। वह रात-दिन काम करवाता।
सैकडों लोग रोड पर डामर मिली गिट्टी बिछाने का काम कर रहे थे। दूर-दूर तक लोगों के झुण्ड के झुण्ड दीखते। वे सब नंगे पैर और नंगे हाथों यह काम कर रहे थे। ठेकेदार के लोगों ने उन्हें बेलचे चलाना और रोड पर मिश्रण को बराबर बराबर फैलाना सिखाया था। वे लगातार उस काम में लगे थे। आबाध और बेतहाशा। पूरी रोड पर बेलचे से मिश्रण पटकने और उसे बराबर फैलाने वाले सैंकडो लोग काम पर जुटे थे। विशु साइकिल के कैरियर से झुककर देखता तो काली रोड पर दूर-दूर तक काले पैर दिखाई देते। टहनी, पत्ते और डामर में लिपटे हुए पैर। कई पैरों पर घुटने तक जलने और छिलने के घाव थे। कुछ घावों पर पट्टी बंधी थी और कुछ खुले हुए थे। पतली काली टाँगों पर डामर की पपडियाँ चिपकी थीं। उधडी खाल के नीचे से झाँकता लाल माँस के थेगडे, जम चुके रक्त की धारियाँ और मिट्टी, धूल और डामर से भरी पैर की मोटी बिवाइयों को विशु गौर से देखता। कांवड पर ड्रम ढोते लोगों के हाड-हाड पैरों की हड्डियाँ लचकतीं। उखडे नाखूनों और घावों से भरे पैर धूल भरी रोड पर सरपट चलते।
उन सबके बाल बिखरे थे। आग के सामने काम कर उनके चेहरे पक गये थे। विशु को याद है एक बार काम करने वालों की पारी बदल रही थी। पुराने काम करने वाले जा रहे थे और नये काम करने वाले उनकी जगह आ रहे थे। वह साइकिल के कैरियर पर बैठा था। उसके पिता साइकिल थामे थे। सैकडों काले लोग साइकिल के दोनों तरफ से गुजर रहे थे। उनके पास से जलते कोलतार और धुँये की बू आ रही थी। वे चुपचाप जा रहे थे। उनकी आँखे फटी-फटी सी थीं। उनके चेहरे झुलसे हुये थे। कालिख में लिपटे पत्थर के मानिंद। उनके उलझे बिखरे काले भूरे बाल पूरे चेहरे को ढँक लेते थे। वे मशीन की तरह चल रहे थे ....बेआवाज और भावविहीन। वे पसीने से लथपथ थे। धुँये, पसीने और तारकोल की मिश्रित तीखी गंध चारां ओर भर गई थी। उनमें एक दो बुजुर्ग ऐसे भी थे कि उनकी लंगोट खुल गई थी और उन्हें पता भी नहीं चल रहा था कि वे पूरी तरह से नग्न हो गये थे। विशु को याद है कि किस तरह एक बुजुर्ग के मुँह के कोने से लार बह रही थी और वह झुका हुआ बुरी तरह हाँफता चला जा रहा था। ठेकेदार का आदमी इन सबको खूब दारू पिलाता था। जब-जब वे भूखे होते ठेकेदार उन्हें दारु पिलवाता। दारु पीकर वे सब जानवरों की तरह काम में जुत जाते। सुबह शाम बस दारू और फिर थककर, जलकर निढाल होने तक वे सब जुते रहते। वहाँ जले के इलाज के नाम पर सिर्फ पानी था। कोई छाया नहीं। कोई खाना नहीं। कोई पगार नहीं। कोई दया नहीं। बस सिर्फ और सिर्फ राजा की आज्ञा और उसका पालन।
विशु को एक रात सपने में वे चेहरे दीखे थे। उनके कोयले सरीखे हो हो गये चेहरों पर बाहर को निकलती सफेद कोटर सी गतिविहीन आँखें अक्सर उसके सामने आ जातीं। कुछ आँखे लाल हो आई थीं , तो कुछ बिल्कुल पीली थीं। कुछ चेहरे इतने झुलसे हुये थे कि लगता था, कि उन्हें दागा गया हो।
क औरत अक्सर विशु के सामने आ जाती । वह थोडी-थोडी दूर चलकर जमीन पर उकडू बैठ जाती। अपना पेट पकडकर सिर झुकाकर उकडू। चलती, फिर बैठती । वह उल्टी कर रही थी। उसकी छाती पर उसका बच्चा चिपका था। वह लडखडाती चलती थी। फिर रूककर अपना पेट पकड़कर जोर जोर से चीखती थी। उसके बाल बिखरे थे। पूरे पैर डामर से लथ पथ थे। पैर की फटी बिवाइयों से खून निकल रहा था। वह जानवरों की तरह से चीखती थी । ठेकेदार के लोग उस पर हंसते थे। बुजुर्ग कहते थे कि उस पर प्रेत आ गया है। जिस दिन विशु ने उसे पहली बार देखा था वह डर गया था और साइकिल के कैरियर पर बैठा-बैठा रोने लगा था। शशांक उसे वापस ले आये। उसका रोड रोलर देखन का मन करता, पर उन चेहरों और उन लोगों को याद कर वह डर जाता। शशांक फिर उसे वहाँ नहीं ले गये।
एक रात शशांक विशु की माँ से पूछ रहे थे, कि उन्होंने डॉक्टर का पत्र न भेजकर गलत तो नहीं किया। फिर कहने लगे उस जगह किसी पत्रकार को जरुर आना चाहिए। भले जंगल के लोग न समझ पायें पर दुनिया तो समझे। फिर अनमने भाव से कहने लगे पता नहीं दुनिया कभी यह जान भी पायेगी या नहीं कि किस तरह जंगल के लोगों से भूखे नंगे रहकर काम करवाया गया। उन्हें बेवकूफ बनाकर आग की भट्टियों में झौंक दिया गया। पता नहीं कभी कोई जंगल हाथ थामेगा भी या नहीं...कभी बाँटेगा उसका दर्द, लगायेगा उसके लिए इंसाफ कि गुहार....कि कोई समाचारपत्र बतायेगा सारी दुनिया को कि किस तरह इंसान को इंसान नहीं समझा गया...किस तरह बीमारी और मौत पर लगाये गये ठहाके...कभी, कोई कहीं....। विशु के पिता उस रात डॉक्टर के पास गये, माँ पुकार लगाती रही कि खाना तो खा जाओ...पर डॉक्टर नहीं था और लौटकर विशु के पिता ने तय कर लिया कि वो पेपरवालों को डॉक्टर का पत्र भेज देंगे....पूरे वाकये के बारे में बतायेंगे।
(4)
जिन दिनों रोड बन रही थी, उन दिनों गाँव में एक घटना हुई।
बस्तर के उस गाँव में विशु के घर से थोड़ी दूर एक पुरानी कच्ची-पक्की कुठरिया थी। जिसे रोड बनाते समय ठेकेदार ने ठीक-ठाक कराया था। उस कुठरिया में ट्रकों में भर कर आया सीमेंट रखा गया। जब रोड बननी चालू हुई तो रोज बैलगाड़ी में लादकर सीमेंट के बोरे रोड की तरफ ले जाये जाते। रोड पर बने कुछ पुराने-धुराने पुल ठीक किये जा रहे थे। सीमेंट रोज आता और रोज भेजा जाता।
ठेकेदार कभी-कभी आता। कुठरिया के भीतर कमर पर हाथ रख खड़ा होता। वह एक ठिगना काला आदमी था। लस्त और मोटा। आलसी और ठस्स। चलते समय वह बहुत छोटे कदम लेता था। थोडी-थोडी देर में रुकता मानो थक गया हो। हाथ तो उसके हिलते ही नहीं थे। वह बहुत कम बोलता। सारा काम आँखों से करता। आँखों से ही गोदाम के हालात जांच लेता। देखकर ही सीमेण्ट की बोरियां गिन लेता। वह देखकर जानता था। उसकी चेतना नजरों की चेतना थी।
कुठरिया की देखरेख एक बुजुर्ग करता था। बुजुर्ग बस्तर के जंगल का बुजुर्ग था। वह कृषकाय था। वह सचेत रहता। उसके चेहरे की झुर्रियां हमेषा तनी रहतीं। उसका डील-डौल थकान भरा था, मानो अभी-अभी कोई कठिन काम किया हो। उसके सफेद खिचड़ी बाल कंधे तक थे। गर्दन और माथे की झुर्रियों में पसीने की सफेद लकीरें दीखतीं। उसके पास से ताड़ी की बू आती थी। ऐसी जबरदस्त बू कि ठेकेदार उस बू से ही उसके होने को तस्दीक कर लेता था।
बुजुर्ग ने एक दिन ठेकेदार को बताया कि जंगल में चोरी नहीं होती। उसने ठेकेदार को बताया कि, जंगल बहुत पिछड़े हुए हैं। जंगल इतने पिछडे हैं, कि यहाँ चोरी नहीं होती है। इतने गैर गुजरे कि यहाँ अपराध नहीं होते। जैसे अगर किसी को किसी की गर्दन काटनी है तो वह गर्दन काट ही देगा उसी तरह जैसे वह मुर्गे या बकरे की बलि देते समय करता है। फिर गांव की थानागुढ़ी में उस आदमी के कटे सिर को ला कर रख देगा। यह फिर जंगल के लोगों की मर्जी है कि वे उसे सजा दें या छोड़ दें। बुजुर्ग ने उसे बताया कि जंगल में हत्या एक प्रकृति है । इंसानी फितरत । जंगल इतने अपढ़ हैं, कि जंगल में हत्या एक किस्म का आवेग है, क्रोध है, प्रतिकार है..... । इसमें सही या गलत बात जैसा कुछ भी नहीं।
बुजुर्ग ने ठेकेदार को बताया कि, कुठरिया में रखे बोरे गिनना समय की बरर्बादी है। इंसान के साढ़े चार लाख साल के इतिहास में बस्तर के जंगलों में कभी चोरी नहीं हुई। बुजुर्ग ज्ञान की बस एक ही बात जानता था कि इंसान का इतिहास साढ़े चार लाख साल का है। यद्यपि उसे पता नहीं कि इतिहास क्या है? वह साढ़े चार लाख साल का हिसाब भी नहीं लगा सकता। पर वह अपने काले पीले टूटे बेतरतीब दाँतों के साथ मुस्कुराता यह सब कहता। यह लाइन उसने रट रखी है। वह अक्सर कहता रहता कि बस्तर में इंसान के साढ़े चार लाख सालों में भी यह नहीं हुआ या वह नहीं हुआ। जैसे वह अक्सर कहता कि पिछले साढ़े चार लाख सालों में किसी ने भी यहाँ चप्पल या जूते नहीं पहरे। जंगलों में पाँव पिछले साढ़े चार लाख सालों से नंगे पाँव ही हैं। साढ़े चार लाख साल बाद आज भी जंगल के लोग समझ नहीं पा रहे कि नंगे पाँव बेहतर हैं या चप्पल या जूते वाले पाँव। वह अक्सर लोगों को जंगल के उन लोगों से मिलवाता जो हाथों में चप्पल पकड़े होते, पर जिनके पैर नंगे होते। वे चप्पलों को सँभालकर रखते और पैरों को नंगे पाँव। बुजुर्ग के पास साढ़े चार लाख साल की कई बातें थीं। हर बात घोर अचरज से भरी हुई।
...वह एक विरला बुजुर्ग था। निष्छल पर अद्भुत। मासूम पर पूरी षिद्दत से गम्भीर। उसे अक्सर भयाक्रान्त होकर या कई बार लोगों को सचेत करते हुए सुना गया था- कि इंसान के साढे चार लाख साल के इतिहास की यह पहली घटना है, कि वे इसके पहले साक्षी हैं। लोग हँसते। वह भी हँस देता।
तो वही कहता था, कि इस जंगल में कभी चोरी नहीं हुई। ठेकेदार को बुजुर्ग की बात सही लगी। उसने कुठरिया की बोरियां गिनना बन्द कर दिया। फिर उसने कुठरिया आना भी बन्द कर दिया। कुठरिया अब पूरी तरह से बुजुर्ग के जिम्मे थी।
गांव में जो एकमात्र दुकान थी वह जंगल के लोगों को मुफ्त में कपड़े बांटती थी। वह दुकान हर चीज की दुकान थी । नून, तेल, लकडी से लेकर कपडे तक । दुकान के बाहर एक बोर्ड लगा था। बोर्ड में लिखा था कि इस दुकान में क्या-क्या मिलता है। वह एक अनमना, बेतुका सा बोर्ड था, क्योंकी उसे पढ़ने वाला वहां कोई नहीं था । वह बोर्ड उन लोगों के बीच था, जिनकी भाषा में अभी शब्द लिखे नहीं गये थे। शब्द ही क्या, वहाँ तो वर्णाक्षर भी नहीं थे। वर्णाक्षर ही क्या, वहाँ तो लिखना भी नहीं था। आप बस्तर के पूरे जंगल घूम लें, वहाँ आपको लिखे हुए चित्र मिलेंगे, लिखे हुए रंग मिलेंगे, पर वहाँ लिखे हुए शब्द नहीं मिल सकते। आज भी कोई उपाय नहीं हुआ कि माड़िया, दोरली, भतरी या हल्बी को कैसे लिखा जाये। वह एक अलिखित भाषा की दुनिया थी। अलिखित भाषा की दुनिया में दुकान के उस बोर्ड पर लिखा था कि यह किराने की दुकान है। अलिखित भाषा की उस दुनिया में बोर्ड पर लिखा था कि इस दुकान में नमक मिलता है। जंगल के बहुत से लोग जिन्हें नमक खरीदना होता था, उस बोर्ड को देखते थे। लिपिविहीन जंगल की बहुत-सी आँखें, जिन्हें मिट्टी का तेल चाहिए होता था, वे गौर से उस बोर्ड को देखती थीं। उस बोर्ड में हिन्दी के सुन्दर अक्षरों में लिखा था- यहाँ मिट्टी का तेल मिलता है।
जंगल की आँखें बोर्ड को देखतीं । ताकतीं । टुकुरतीं। औरतें मुंह पर हाथ रख, गौर से उसे घूरतीं। कुछ अधखुले मुंह वाले चेहरे उस बोर्ड को ताकते- अवसन्न । उन्हें बोर्ड और दुकान में कोई सूत्र समझ नहीं आता था । बोर्ड बारिश में नहाता रहा। धूप में चटकता रहा। उसका पेण्ट उखडता रहा। उस पर फैलता जंग शब्दों को लीलता रहा। शब्द बदरंग हुए। भूरे थेगडों और टीन के चमकदार धब्बों से बोर्ड भर गया। शब्द खत्म हो गये और इस तरह पूरे जंगल को पता चल गया कि दुकान में क्या-क्या मिलता है?
उन दिनों इसी दुकान में एक सरकारी मुलाजिम अक्सर आता था, हफ्ते में तीन से चार बार।
वह किराने वाले को उन कपड़ों की कीमत अदा करता था, जो वह जंगल के लोगों को दे देता था। सरकार का हुक्म था । हुक्म था, कि जंगल के लोगों को कपडे़ बांटे जायें । सरकार पैसे देगी । जंगल के लोगों को कपड़ा मुफ्त में दिया जाय । कहते हैं एक दिन उसने किराने वाले को हड़काकर कहा था कि अगर एक भी फटेहाल आदमी दीखा तो वह उसे जेल में डाल देगा। किराने वाला डर गया। जंगल के लोगों को इतने कपड़े देने के बाद भी फटेहाल लोग दीख ही जाते थे। जब भी कोई फटेहाल आदमी दीखता तो दुकानदार उसे अपनी दुकान ले आता और दो-चार जोड़ी कपड़ा थमा देता। बुजुर्ग के अनुसार इंसान के साढे चार लाख साल के इतिहास के वे पहले लोग थे, जिन्होंने सही सलामत कपडे पहरे।
कपडे आ गये तो ठण्ड भी आ गई।
बस्तर के जंगल के आदमी को अब ठण्ड लगने लगी थी। जैसे-जैसे कपड़े आते गये उसको लगने वाली ठण्ड बढ़ती गई। वही आकाश, वही जंगल, वही सूरज, वही चांद.....पर ठण्ड बढती गई। जंगल का आदमी अब कपड़े बिछाता, कपड़े ओढ़ता, कपड़े पहरता तब जाकर ठण्ड खत्म होती।
दुकानदार तैलंगाना से आया था। एक दिन दुकानदार के तैलंगाना के गांव में बड़ी भयानक दुर्घटना घटी। वह अपनी दुकान बन्द कर अपने गांव चला गया। कहते हैं उस दुर्घटना में उसके परिवार के लोग मारे गये। तो कोई कुछ और बताता। दुकानदार फिर नहीं लौटा। किराने की दुकान पुरानी होकर जार-जार होने लगी।
...जिन बैलगाड़ियों से लदकर सीमेण्ट जाता था, उसमें जंगल के एक किशोर को काम पर लगाया गया था। किशोर का नाम मंधा था। किशोर का काम था, गोदाम के बोरे उठाकर बैलगाड़ी में लादना। वह अपने पास गिट्टियां रखता था । छोटी चिकनी गिट्टियां । जितनी बोरी बैलगाडी में लदती, उतनी चिकनी गिट्टियां वह अपने दूसरे हाथ में रख लेता । पूरे रास्ते बैलगाडी में बोरों के ऊपर वह बैठा रहता । मुठ्ठियों में चिकनी गिट्टी भींचे रहता । जब बैलगाडी मुकाम पर पहुंचती वह उन गिट्टियों को वहां के छोटे मुलाजिम को दे देता । छोटा मुलाजिम उन गिट्टियों को गिनता और बोरों को गिनता और फिर कागजों में लिख लेता । जितनी गिट्टी, उतने बोरे । मिलान हमेशा सही रहता । सारे हिसाब मंधा की मुठ्ठी में भिंची गिट्टी से तय होते। छोटा मुलाजिम अक्सर मंधा को चेताता । मंधा सतर्क रहता । वह ठीक से मिलान कर चिकनी गिट्टियों को हाथ में भींच लेता । पसीने से भीगी मुठ्ठी में वे इस तरह भिंची रहतीं, कि कभी न गिरें ।
जंगल में गिनती नहीं, जंगल के हिसाब में जोड नहीं, घटाना नहीं, नहीं हैं अंक ही और इस तरह वह कभी गलत नहीं होता । जंगल की चेतना बताती है, कि अंक और नंबर हिसाब को गड़बड़ करने के लिए हैं । अंक इसलिए हैं, ताकि जोड-घटाना गलत किया जा सके। नंबर और संख्यायें हिसाब को गड़बड़ कर उन्हें मन माफिक बना लेने के लिए हैं।
एक रात मंधा गाँव में अपनी झोंपडी के सामने बैठा था। आग जल रही थी। सामने एक बुजुर्ग जमीन पर बैठा कांप रहा था। बुजुर्ग का नाम सोमारु था। बरसों पहले दुकानदार ने जो चादर सेमारु को दी थी, वह तार-तार हो गई थी। गांव में अब कपड़ा नहीं मिलता था। दुकान बंद हुए अर्सा बीत गया था । मंधा ने सामारु को एक उपाय सुझाया । सोमारु तैयार हो गया।
....अगली देर रात मंधा और सोमारु सीमेण्ट के गोदाम की तरफ़ गये। वह अंधेरी रात थी । सामारु ने कहा था, कि दिन में ही चलेंगे । पर मंधा ने कहा कि यह काम दिन में नहीं किया जा सकता है। उसे पता था, कियह काम रात को ही किया जाता है । देर रात को । गोदाम के पीछे एक खिड़की थी जिसे ठोक-पीटकर ठीक किया गया था। खिडकी बंद थी। चारों ओर अंधेरा था। दूर-दूर तक कोई भी नहीं था।
म्ांधा ने कुल्हाड़ी के एक ही वार से खिड़की तोड़ दी थी। खिड़की औंधे मुंह ज़मीन पर गिर गई। मंधा और सोमारु गोदाम के अंदर घुस गये। गोदाम के भीतर सीमेण्ट के बोरे रखे थे। सैंकडों बोरे। एक के ऊपर एक। मंधा सीमेण्ट के बोरे को नीचे खींचकर गिराता। फिर घसीटकर सोमारु के पास लाकर पटक देता। सोमारु सीमेण्ट के बोरों की सिलाई कुल्हाड़ी की धार से काटता जाता। फिर सीमेण्ट के बोरे से सीमेण्ट झाड़कर बोरों को अलग से एक तरफ़ इकट्ठा करता जाता। फिर जब पांच बोरे हो गये, तो उसमें से दो बोरा मंधा और तीन बोरा सोमारु ले गया। मंधा और सोमारु उन बोरों को पहरते, ओढ़ते, उन पर सोते। इस तरह ठण्ड गायब हो गई।
...अगले दिन सुबह गोदाम पर हड़कम्प मच गया।
...गोदाम के आसपास पाँच छह लोग जमा थे । ठेकेदार ज़मीन पर मुँह के बल पड़ी खिड़की को देखता और गोदाम की देखभाल में लगे बुजुर्ग को डाँटता। अगले दिन शाम होते-होते पुलिस का एक आदमी भी वहां आ गया । वह बहुत दूर के किसी पुलिस थाने से आया था । मुलाजिम ने एक आदमी को सुबह-सुबह ही साइकिल पर थाने भेजा था और वह देर रात पहुंचकर गोदाम में चोरी का सारा किस्सा वहां के दरोगा को बता आया था । पुलिस का आदमी कभी गोदाम के भीतर जाता, तो कभी बाहर। ठेकेदार उस गोदाम के दरवाजे के पास रखे स्टूल पर सर पकड़े बैठा था। उसने बुजुर्ग को इतना डांटा कि बुजुर्ग रुआंसा हो गया। थोडी दूरी पर लंगोटी लगाये खडा वह कृषकाय बुजुर्ग कांप रहा था।
बुजुर्ग की मानें तो इंसान के साढे चार लाख साल के इतिहास में यह पहली चोरी थी। जंगल के पिछले साढे चार लाख साल में घटा पहला वाकया।
‘हैड साहब। चोर हर हाल में पकड़ा जाना चाहिए।’
ठेकेदार बार-बार पुलिसवाले को उंगली दिखा-दिखाकर कह रहा था। पुलिसवाला चुपचाप खडा था। हाथ लटकाये। कुठरिया को अपलक घूरता। ठेकेदार पुलिसवाले पर झुंझला गया।
‘आपको मेरी बात सुनाई नहीं दे रही है क्या?’
‘मैं यह देख रहा था कि क्या इसे चोरी कह सकते हैं?’
‘मतलब?’
ठेकेदार की भृकुटियां तन गईं। पुलिसवाला ठेकेदार को समझाने लगा कि देखिए वे सीमेण्ट तो यहीं छोड़ गये। वे सीमेण्ट तो नहीं ले गये न। वे तो सिर्फ बोरा ले गये।यह सीमेण्ट का ही तो गोदाम है, बोरों का थोड़े है। सीमेण्ट के गोदाम से अगर कोई सीमेण्ट ले जाता तो मामला बनता । सीमेण्ट के गोदाम से अगर कोई बोरा ले जाये तो मामला थोडे ही बनेगा। देखो-देखो यहीं पडा है सीमेण्ट। प्रमाण है कि वे एक चुटकी सीमेण्ट भी नहीं ले गये।
‘....ऐसी चोरी पहली बार देखी, कि चोर बोरा ले जाये और सीमेण्ट छोड जाये ।’
पुलिसवाला बुदबुदाया।
पुलिसवाला अपने साथ एक किताब लाया था। कानून की किताब। किताब बेहद मोटी थी । किताब में जंगल के कायदे नहीं लिखे थे । दुनिया की किसी भी किताब में जंगल के कायदे नहीं हैं। जंगल की सोच । जंगल की नैतिकता । उनके कायदे । बीहड नियम....जिनकी किसी किताब को दरकार नहीं ।
‘ ठण्ड न होती तो क्या वे बोरे ले जाते.... नहीं न । जाने दीजिए । कितनी भयंकर ठण्ड है। ठण्ड से खुद को बचाने...पाँच बोरे ही तो ले गये न वे...सिर्फ पाँच।’
‘ पर चोरी तो चोरी है।’
‘ जो सीमेण्ट छोड जाये वह काहे का चोर ...।’
‘ आप तो शिकायत दर्ज कीजिये । अपना काम कीजिये ।’
‘ आप समझिये तो । इतनी ठण्ड में सिर्फ बोरे की शिकायत....आप खुद सोचिये, बोरे की शिकायत लिखना कितना गलत है..... ।’
ठेकेदार ने जंगल की तरफ देखा । कच्चे रास्ते के पार जंगल अनमना सा था। एक पगडण्डी उसमें जाकर कहीं गुम हो जाती थी । सागौन की धूसर घनी छवियों पर शाम की सिंदूरी आभा ठिठकी थी । वहां कोई आवाज नहीं थी । बहुत ध्यान से सुनने पर कहीं बहुत भीतर से किसी पंक्षी के किर्राने की आवाज़ आ रही थी । एक सन्नाटा था जो बिल्कुल भी अजीब न था। जंगलों के बीच टुकडा-टुकडा आकाश था। एक टुकडा आकाश अनमना सा कुछ फुनगियों के ऊपर आराम कर रहा था। बच्चों की तरह टुकुरता। आसपास चार-पाँच लोग थे। अर्धनग्न और खामोश। पता नहीं जंगल की किस अनाम और अज्ञात दुनिया से वे आये थे ? बहुत बेतुका था उनसे यह पूछना कि वे क्यों आये थे ? अनके काले चेहरों पर कौन सा तो भाव था ? न जाने क्या तो कहती थीं उनकी आँखें ? पता नहीं वे क्या करते यह जानकर कि जो घटित हो रहा था वह क्या था ? कितना तो अटपटा था यह मानना कि एक कानून होता है ? एक किताब जिसे भारतीय दण्ड संहिता कहते हैं। एक अपराधबोध चीर देता था मन को यह जान कि कहीं लिखा है कि अपराध है चोरी।
यूँ लागू था कानून, जंगल की दुनिया पर.....।
‘ जाने दीजिये।’
पुलिसवाले ने आहिस्ते से कहा ।
‘ठीक है ।’
ठेकेदार के चेहरे पर एक हताशा, एक हार उतर आई । बुजुर्ग आदमी ठेकेदार के पैर पकड़े गिड़गिड़ा रहा था-
‘हुजूर अब तो हैड साहेब ने भी मान लिया कि यह चोरी नहीं है। मुझे नौकरी से मत निकालिए। मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं।’
म्ांधा करीब दो घण्टे से यह सब देख रहा था। वह काफी पहले ही बैलगाड़ी के साथ आ गया था। वह सिर नीचे किये चिकने पत्थरों को एक हाथ से दूसरे हाथ में उछाल रहा था । वे पत्थर कभी जमीन पर नहीं गिरे । सिर्फ पाँच चिकने पत्थर, हथेली के पसीने में चिपकी पाँच अंकों की चेतना, दिल दिमाग में उतरता एक स्पर्श, एक खयाल....पाँच सिर्फ पाँच...।
वे पाँच बोरे कभी भी जंगल के बाहर नहीं आये।
पुलिसवाले ने जाते-जाते ठेकेदार को एक अजीब सी बात कही। ठेकेदार को उस बात का मतलब न समझ आया।
‘ ....जहाँ ताला पडा होता है इश्क के दरवाजे पर.....उसे चोरी कहते हैं।’
उस रात चोरी के बाद मंधा और सोमारु जंगल जा रहे थे । मंधा ने सोमारु को बताया कि वे जो छोड आये उसे सीमेण्ट कहते हैं। दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुराये। सोमारु ने सिर्फ इतना ही कहा कि, कितनी तो फालतू चीज है सीमेण्ट। बाहर की दुनिया के लोग जाने क्या-क्या फालतू बटोरकर रखते हैं।
रोड का काम खत्म था।
डॉक्टर भी ठीक होकर घर जा चुका था। फिर घर से कहीं और....।
‘ पता नहीं कहाँ चला गया....।’
देर रात उसके घर से लौटते हुए शशांक ने खुद से कहा था।
सब इंजीनियर गजोधर पण्डा अपने बडे साहेब से मुखातिब था। बडा साहेब रोड का आखरी हिसाब कर रहा था। वह उन मस्टर रोल को बहुत आत्मीयता से देख रहा था, जिस पर फर्जी अंगूठों के निशान लगे थे। पाँच छःह लोगों से काले और बैंगनी पैड पर उंगलियाँ रगडवाकर बडे इत्मिनान से गजोधर ने मस्टरों पर जगह जगह उन अंगूठों को अंकित करवाया था। बडा साहेब उन दस्तावेजों पर बडे प्यार से हाथ फेर रहा था।
‘लेबर कंपोनेन्ट में पूरे बावन लाख रूपये हैं सर । अभी कुछ और काम भी करवाने हैं। जंगल में राजा अभी भी जिंदा है। जंगल का राजा अभी बरसों तक मरेगा नहीं। कहीं कोई दिक्कत नहीं । ’
‘ओ.के.। पर तुम्हें नहीं लगता कि सुनार को हमने ज्यादा पैसे दे दिये।’
‘मुझे भी लगा था। पर काम बेहद जोखिम भरा था। उसे एक काम अभी और करना है। एक भयानक काम।’
‘भयानक काम ?’
गजोधर मुस्कुराया। बडे साहेब ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। फिर इत्मिनान से कुर्सी में धंसते हुए अपना सिर पीछे टिका लिया।
‘सुनार कता रहा था कि उसके पास काम करने वाला लडका अब यह मानने लगा है कि राजा जिंदा है।’
बडा साहेब पसरे-पसरे ही मुस्कुराया।
कोदरा कुछ दिनों के लिये अपने गाँव लौट रहा था। सुनार ने उसे कुछ पैसे दिये थे और एक तुंबा भरकर ताडी।
कोदरा को शहर आये कुछ समय बीत चला था। अपने जैसे और लडकों के बीच उठते बैठते उसे कई बातें समझ आने लगी थीं। वह यह भी समझने लगा था कि राजा मर चुका है। जंगल के लोगों का यह मानना कि राजा अमर है कोई सही बात नहीं है। राजा भी ठीक उसी तरह मर सकता है जिस तरह कोई साधारण इंसान मरता है। राजा को मारने वाले हथियार पानी नहीं बनते । राजा के मरने से शायद अकाल भी नहीं पडता और न ही कोई प्रलय आती है। यह ठीक है कि जंगल के लोग ऐसा मानते हैं, पर यह हकीकत नहीं। जैसे-जैसे वह इस सच को मानने लगा वैसे-वैसे ही उसे यह बात परेशान करने लगी कि अगर राजा मर गया है तो सुनार ने उससे राजदण्ड क्यों बनवाया ? एक मर चुके राजा के राजदण्ड की भला किसी को क्या और क्यूँ जरुरत आन पडी। उसने सोचा कि गाँव से लौटकर वह अपने दूसरे शहरी साथियों से इस बारे में बात करेगा। कभी यह सब सोच उसका मन भारी हो उठता, एक अजीब सा भय उसे अपनी गिरफ्त में ले लेता....।
शाम घिर आई थी। वह पगडण्डी-पगडण्डी जा रहा था। सुबह की बारिश के बाद जंगल गीला था। उसे अभी तीन दिन अैर चलना था। उसे भूख लगी थी। वह एक पेड के नीचे बैठ गया। उसने दो कौर खाना खाया और फिर दो घूँट ताडी पी। वह थोडी देर पेड की छांव में बैठा रहा। फिर वह चलने के लिये उठा, पर उसे लगा जैसे उसके पैरों को लकवा मार गया है। वह लडखडाता सा थोडी दूर तक चला। पर फिर वह वहीं घास पर गिर गया। वह देर तक झाडियों के पास पडा रहा। उसके हाथ-पैर सुन्न हो गये थे। पगडण्डी पर बहता पानी उसके शरीर से टकराता बहता रहा। हाथ पैर मारने की कोशिश में कीचड में उसकी उंगलियाँ धंसती रहीं। नाखूनों में मिट्टी के लेबडे फंसते और घास पर उसके पैर फडफडाते। उसका जाँघ से पेशाब की धार निकलकर कीचड में मिल रही थी।
रात घिरने लगी थी। जमीन पर बेसुध पडे उसने देखा झाडियों से दो लकडबग्घे उसकी ओर देख रहे थे। उसने एक दो बार अपनाप सिर हिलाने की कोशिश की। उसके मुँह से झाग निकलने लगा। उसका सिर धीरे-धीरे सुन्न होता गया। आँखों के भीतर अंधेरे का गोला सा उतर आया। गहरा और बडा होता गोला। फिर उस गोले ने हर चीज को काला कर दिया। दिमाग से शुरु हुई सुन्नी धीरे-धीरे पूरे शरीर पर फैल रही थी। शरीर की हर धडकन उस सुन्नी में समाकर खत्म होती जा रही थी। जैसे एक के बाद एक दिये बुझते हैं। उसे दो बार हिचकी आई। एक दो बार उसने जोर की साँस ली। कहीं कोई दर्द नहीं था। दर्द की हर चेतना मिट गई थी। वह एकदम शांत हो गया। आँखें खुलीं जडवत। बस उंगलिया हल्की-हल्की काँप् रही थीं। मुँह खुल गया था और उसमें से लार के साथ झाग अब भी रिस-रिसकर गिर रहा था। लकडबग्घे उसके पास आये। उसके मुँह और सिर को उन्होनें सूँघा। फिर एक ने उसके गर्दन में अपने दांत गडा़ दिये। वे उसे घसीटकर जंगल के भीतर ले गये।
सुनार ने कोदरा की ताडी में काफी मात्रा में जहर मिलाया था। जहर मिलाते समय उसने खुद से कहा था -
‘ क्या अंतर पड जाता अगर तुम यह मानते रहते कि राजा जिंदा है ? सारा जंगल तो मानता है। है न.....।’

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