....हँसी जो है इतिहास के पन्ने पर एक लिखत.जिसे फिर से पलटकर पढ़ा जाना है.
....पता नहीं वह कौन सा रास्ता है जो हँसी तक जाता है ?वह गाँव, वह शहर जहाँ रहती है बेलौस, खिलखिलाती, गुदगुदाती खिलर, जो सिर्फ खिलार है और कुछ नहीं ? पता नहीं वे कौन कौन सी छातियाँ हैं, जिनमें आज भी जिन्दा है कोई सच्ची हँसी ? पता नहीं वह कौन सा घर होगा जहाँ आज भी बंटती होगी सच्ची हँसी ?
....क्या हँसी का आज भी कोई बसेरा बचा है, कहीं ?
....हँसी हमारे समय का कितना दुर्लभ एक्सप्रेशन ? कितना अल्प, कितना कमत...र, कितना तो अद्रश्य...?
...हँसी चुप .हँसी अंत.हँसी अँधेरा.
....बाबूजी गाँव को हँसाना चाहते थे.

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